सागर से भोपाल तक – एक ट्रांसफर की महागाथा!
✍️ राजनीति के रण से सीधा व्यंग्य
सागर नगर निगम के आयुक्त राजकुमार खत्री का ट्रांसफर क्या हुआ, सियासी पारे ने मानो खुद को नया चार्जर लगा लिया हो।
महापौर से उनका मेल-जोल नहीं था, कलेक्टर साहब जांच बैठा चुके थे, और ऊपर से शिकायतें भोपाल की फाइलों तक पहुंच गई थीं। अब भला बताइए, ऐसा माहौल तो किसी OTT सीरीज की स्क्रिप्ट में भी नहीं मिलता!
लेकिन जनाब, कहानी में ट्विस्ट तो तब आया जब ट्रांसफर के बाद श्रीमान सीधे भोपाल पहुंच गए। और खबरें आने लगीं कि अब ट्रांसफर “रुक” सकता है। मतलब जिस ट्रांसफर के लिए चार नेता, दो विधायक और एक सांसद तकरीबन “इन्वॉल्व” हो चुके थे, अब वही ट्रांसफर वेंटिलेटर पर चला गया है।और मानो सब कह रहे हो कि”लौट आओ आयुक्त जी!”
अब जनता सोच में पड़ गई है –
क्या आयुक्त का ट्रांसफर हुआ था या सिर्फ “घोषणा” हुई थी?
कहीं ऐसा तो नहीं कि ये ट्रांसफर भी चुनावी वादों की तरह “कागजों तक ही सीमित” हो?
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी साबित कर दिया कि सागर की राजनीति में कुर्सी से ज्यादा मजबूत कुर्सी के नीचे की लॉबी होती है।
और हाँ, एक बात तो तय है –सागर में ट्रांसफर अब कोई सरकारी प्रक्रिया नहीं,बल्कि एक राजनीतिक इवेंट है – जिसमें प्रेस रिलीज से ज्यादा जरूरी है पैरवी लिस्ट!
